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मोदी आज के गाँधी

महात्मा गांधी अपने निष्पक्ष एवं निर्भिक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे। उनमें आगे बढ़कर नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। गांधीजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर भी बहुत बहस चलती रहती है किन्तु विश्व ने गांधीजी के व्यक्तित्व को निर्विवाद रूप से स्वीकार किया और यही कारण है कि उनके जन्म दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व शांति एवं अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

गांधीजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को दो दृष्टिकोणों से विश्लेषित किया जाता है। प्रथम दृष्टिकोण में गांधीजी सामाजिक बुराईयों एवं विद्रुपताओं को दूर करने पर बल देते है, आर्थिक रूप से आत्म निर्भर बनाने पर बल देते है, विकेन्द्रीकरण पर बल देते है, सफाई, छुआछूत उन्मूलन, नारी शिक्षा एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात करते है। दूसरे गांधी को लेकर अनेक स्थानों पर उनकी आलोचना होती है। भगतसिंह राजगुरु एवं सुखदेव की सजा को माफ नहीं करवा पाना, पाकिस्तान को धनराशि देने पर अडिग़ हो जाना, देश के बंटवारे को नहीं रोक पाना इत्यादि।

उपयुक्त विश्लेषण में एक बात निर्विवाद रूप से उभर कर आती है कि गांधी पर कोई विवाद नहीं किया जा सकता।

वर्तमान में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस दृष्टिकोण से आधुनिक महात्मा गांधी है जिन्हें हम प्रथम मोदी एवं दूसरे मोदी के रूप में रखकर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का विश्लेषण कर सकते है। प्रथम मोदी सफाई की बात करते है, गांधीजी भी सफाई में भगवान देखते थे, मोदीजी भी यही सोच रखते है। गांधीजी ग्राम स्वराज्य की कल्पना करते थे अर्थात गांव विकास की इकाई बने, मोदी भी मेक इन इंडिया के माध्यम से गांव एवं शहरों को आर्थिक उन्नति का आधार बनाना चाहते हैं।

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गांधी के रूप में उन्होंने तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक आधार पर जंग लड़ी थी, यही काम मोदी कर रहे है। सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार, कौशल विकास के मंत्र इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है।

मोदी ही गांधी जी की अहिंसा को सच्चे मायने में समझते है और प्रयोग भी कर रहे है। अहिंसा गांधीजी के लिए कमजोर व्यक्ति का हथियार नहीं था अपतिु हृदयरूपान्तरण का एक सशक्त माध्यम था। गांधीजी आगे बढ़कर स्वार्थवश हिंसा करने में विश्वास नहीं रखते थे। साथ ही वे कायरता के भी सख्त खिलाफ थे अर्थात किसी भी शोषण का मुकाबला करने की हिम्मत नहीं दिखाने को वह गलत मानते थे। जब उनसे पूछा गया कि यदि हिंसा एवं कायरता में से आपको एक चुनना पडे तो आप किसे चुनेंगे? गांधीजी ने प्रत्युत्तर में हिंसा को चुना क्योंकि उसमें कम से कम साहस तो होता है। किन्तु इस परिकल्पनात्मक प्रश्न के काल्पनिक उत्तर में उनकी अत्याचार, अराजकता के प्रति साहस दिखाने की भावना छिपी हुई थी और यही कारण है कि जब स्थिति हद से ज्यादा गुजर गई तो उन्होंने करो या मरो का नारा दिया और अंग्रेजों भारत छोड़ों का शंखनाद किया।

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RPT….Johannesburg. Credits: PTI Photo

गुलामी की मानसिकता में सोए हुए देश को जगाने में गांधीजी के इस अस्त्र ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। गांधीजी के योगदान को यदि एक शब्द में बयान करना हो तो वह है ”स्वाभिमान”। देशवासियों के स्वाभिमान को गांधीजी ने जगा दिया था।

मोदी के भी अभी तक के कार्यकाल के योगदान को यदि एक शब्द में बयां करना हो तो वह है ”स्वाभिमान”। आजादी से लेकर आज तक भारतीयों में ऐसा अपूर्व जो स्वाभिमान मोदीजी ने ही जगाया है यह अतुलनीय है। विदेशों में देश की जो प्रतिष्ठा एवं आत्मसम्मान बढाया है वह देश के विकास में मील का पत्थर साबित होगा। विकसित राष्ट्रों की विकास की कहानी के मूल में स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान जैसे तत्व ही मुख्य रहे है। सम्पूर्ण विश्व के समक्ष स्वाभिमान के साथ भारतीय होने एवं भारतीयता का जो परिचय मोदी ने दिया है उससे पूरा विश्व चकित है। एवं पूरा देश गदगद् है।

मोदी भारत संघ में नवचेतना का संचार कर देश में राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूट कर स्थापित कर रहे है जो आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है। विभिन्नता वाले इस देश में यह काम एक सच्चा सहिष्णुता, स्वाभिमानी ही कर सकता है। गांधीजी भी सच्चे सहिष्णु थे उन पर जो आरोप लगे वे भी ”मिथ्या” थे। मोदी पर भी ऐसे आरोप लग रहे है वे भी ”मिथ्या” है। गांधीजी यदि असहिष्णु होते तो शायद गांधी नहीं होते, मोदी यदि असहिष्णु होते तो प्रधानमंत्री नहीं बन पाते, अपने व्यक्तित्व से विश्व को प्रभावित नहीं कर पाते। देश में अपूर्व स्वाभिमान नहीं जगा पाते। मोदी के रूप में मोदी इस देश की परम आवश्यकता है उनकी विचारधारा पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता।

पॉलिटिकल गांधी आलोचना-प्रत्यालोचना के विषय हो सकते है इसका कारण दृष्टिकोण की भिन्नता एवं स्वार्थपरकता प्रमुख है। पॉलीटिकल गांधी को भी यदि राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण के भाव से देखा जाता तो आलोचनाएं स्वत: खत्म होने लगती है। ठीक इसी प्रकार पॉलीटिकल मोदी की भी आलोचनाएं होती है किन्तु उनकी आलोचना करने से पहले निष्पक्ष-भाव से ‘राष्ट्रधर्म के दृष्टिकोण’ से उनके कृत्यों का विश्लेषण किया जाना चाहिए।

किसी भी राष्ट्र के लिए दो बाते बड़ी महत्वपूर्ण होती है एक सशक्त विदेश नीति दूसरी आंतरिक सुसंगता। पॉलीटिकल मोदी इन्हीं दो महत्वपूर्ण बातों को आधार बना कर देश को चला रहे है। उनके तरीकों को लेकर बहस की जा सकती है किन्तु उनके ‘मन्तव्य’ पर ऊंगली उठाना राष्ट्र के ”विकास” में ”बाधा” उत्पन्न करने के बराबर है।

गांधीजी यदि वर्तमान आधुनिक परिस्थितियों में होते तो कदाचित इन्हीं बातों एवं विचारधारा पर चलते जिन पर आज मोदी चल रहे हैं। गांधीजी के विचार बदले हुए परिपेक्ष्य में भी प्रासंगिक है। मोदी इसी अर्थ में ”आधुनिक गांधी” कहे जा सकते है जो गांधीजी के राष्ट्रभक्ति के विचारों को मोदी एवं पॉलिटिकल मोदी बन कर पूरा कर रहे हैं।

मुझे चिन्तक के रूप में एक ही अंदेशा है कि कही दिग्रभ्रमित-स्वार्थवादी ताकते गांधीजी, लालबहादुर शास्त्री, सुभाषचन्द बोस, होमी जहांगीर भाभा की तरह इन्हें अपना निशाना ना बना लें।

Late डॉ. बी.एस. प्रधान

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